Friday, November 20, 2009

ग़ज़ल २

चमन में न पनघट न दयार में है
मज़ा जो उस शख्श के इंतजार में है
ख्वाबो सी हसीन बार्गाहो में कहाँ
मज़ा जो इश्क के आबसार में है
तख्तो की चाह वाले बादशाहों में नही
हमारा शुमार तो जां निसार में है
वह मज़ा शत्र्न्ज़ ऐ सियासत में कहाँ
जो नजर के इस खेल के अशआर में है
मुबारक हो जाहिद तुझ को तेरा बहिश्त
हमारी खुल्देवरी तो कू ऐ यार में है
न मन्दिर न मस्जिद मय खाने में नही
शायरों का खुदा तो अशआर में है

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