Monday, March 29, 2010

श्रद्धा

दिया जब संदेश महावीर ने थे तब चले
वानरों की फौज ले प्रभु जीतने लंकेश को
बन रहा था सेतु जल में अत्यधिक उद्दाम गति से
पा रहे थे राम खुद से अति निकट उद्देश्य को
पत्थरों में राम लिखकर रीछ वानर फेकते थे
फेकते पर्वत के पर्वत यह हनुमत वीर थे
नाम से मेरे है तिरते सिन्धु में भीसन पहाड़
सिन्धु तट पर बैठ कर यह सोचते रघुवीर थे
अत्यधिक विस्मय भरा देख कर के यह नजारा
मन में हुआ राम के कुछ कौतुहल कुछ अहंकार
ले कर एक पत्थर यु ही डाल दिया सिन्धु में
डूब गया खंड हुआ तब उन्हें विस्मय अपार
सदा आयी एक की क्या सोचते रघुवीर है
नाम में प्रभु आपके न तनिक भी शक्ति है
तैरते है सिन्धु जल में नाम धारी शिला खंड
क्यों की रीछ वानरों की भावना में भक्ति है
न ही मस्जिद की अजां में न ही संदल की रवां में
न ही भेदी कम्बू ध्वनी न घंटियों के शोर में
आज तलक सांकलो में बांध न पाया कोई
प्यार से भगवन बंधते भावना की डोर में

गजल 8

जमाल ए आतिश बहार ए शबनम
शफक ए मगरिब खुर्शीद रु है
मै डालता हूँ जहाँ निगाहें
तेरा ही जलवा बस तू ही तू है
कभी तू आये हमारी जानिब
हमारे पहलू में आ कर बैठे
मै तेरी जुल्फों के सायबाँ में
असीर हो जाऊ आरजू है
मेरे जेहन में बसी है तेरी
शमीम शीरी सू ए तसब्बुर
मेरी आकबत मेरा खुदा तू
तू ही नमाज़ ओ तू ही वजू है