Saturday, February 15, 2014

तराना ए रेल

क्यों कर बुझे वो सम्मा ईंधन हो जिसका पानी
 लौ जिसकी रक्स में है वो आग है जवानी

 हुई कोशिशें हजारों कुछ रह गई कमी पर
 तब घूम फिर के जिम्मा आया है अब हमीं पर
 एक ख्वाब जिसने सदिओं सबको जगाए रखा 
 वो जावेदा सवेरा उतरेगा कब जमीं पर

 ये दिल की आग लेकर वो आग है जलानी 
 लौ जिसकी रक्स में है वो आग है जवानी

 तूफां व आंधिओं के जो साथ बह रही है 
 हर जंग ए जिंदगी को जो खेल कह रही है
 वह दूर आशियाना जहाँ मौत रह रही थी
 किस ठाट से वहाँ पर एक शै जो रह रही है

 एक बूंद ही है लेकिन दरिया की है रवानी
 लौ जिसकी रक्स में है वो आग है जवानी

ये जीवन कैसा जीवन है


सारा आकाश है कंधो पर
 जीवन भर ढोते रहना है
 ये कैसी दुनिया शोरिश
की बस ग़म ही सहते रहना है
 यह कैसा जड़वत जीवन है
 जो चलकर भी चलता ही नही
इस राह ए आलम में मैं भी हूँ
 जो जी कर भी जीता ही नहीं
 ना दीवारें हैं जिंदां की
 ना जंजीरों के बंधन
 पर खूंटी पर सा टंगा हुआ
 ये जीवन कैसा जीवन है

Monday, March 29, 2010

श्रद्धा

दिया जब संदेश महावीर ने थे तब चले
वानरों की फौज ले प्रभु जीतने लंकेश को
बन रहा था सेतु जल में अत्यधिक उद्दाम गति से
पा रहे थे राम खुद से अति निकट उद्देश्य को
पत्थरों में राम लिखकर रीछ वानर फेकते थे
फेकते पर्वत के पर्वत यह हनुमत वीर थे
नाम से मेरे है तिरते सिन्धु में भीसन पहाड़
सिन्धु तट पर बैठ कर यह सोचते रघुवीर थे
अत्यधिक विस्मय भरा देख कर के यह नजारा
मन में हुआ राम के कुछ कौतुहल कुछ अहंकार
ले कर एक पत्थर यु ही डाल दिया सिन्धु में
डूब गया खंड हुआ तब उन्हें विस्मय अपार
सदा आयी एक की क्या सोचते रघुवीर है
नाम में प्रभु आपके न तनिक भी शक्ति है
तैरते है सिन्धु जल में नाम धारी शिला खंड
क्यों की रीछ वानरों की भावना में भक्ति है
न ही मस्जिद की अजां में न ही संदल की रवां में
न ही भेदी कम्बू ध्वनी न घंटियों के शोर में
आज तलक सांकलो में बांध न पाया कोई
प्यार से भगवन बंधते भावना की डोर में

गजल 8

जमाल ए आतिश बहार ए शबनम
शफक ए मगरिब खुर्शीद रु है
मै डालता हूँ जहाँ निगाहें
तेरा ही जलवा बस तू ही तू है
कभी तू आये हमारी जानिब
हमारे पहलू में आ कर बैठे
मै तेरी जुल्फों के सायबाँ में
असीर हो जाऊ आरजू है
मेरे जेहन में बसी है तेरी
शमीम शीरी सू ए तसब्बुर
मेरी आकबत मेरा खुदा तू
तू ही नमाज़ ओ तू ही वजू है

Wednesday, November 25, 2009

भगवन बुद्ध के नाम

है प्रणाम प्रज्वलित की जिसने गौरवमयीं क्रांति की ज्वाल
जुल्म हिकारत के विरोध में चला उठाकर निर्भय भाल
है प्रणाम उस गौरव शाली दीप्तमान ज्वाला को
नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली उस शाला को
है प्रणाम उस वीर प्रवर को जिसने यह ज्वाला थामी
है प्रणाम उन कोटि नरो को जो बन गये तूर्ण अनुगामी
यूँ इतिहास में छीपे हुए है एक से एक वीर इंसान
जो मानवता का प्रति रूप हो कहती दुनिया उसे महान
जां ब लब सिकन्दर था जब तो बोला जो सरदार थे साथ
देना निकाल तुम बाहर यारो कफ़न से मेरे दोनों हाथ
अजित लड़ाका जिस के आगे रही झुकाती दुनिया माथ
देखे पूर्ण विश्व धरती से गया सिकन्दर खाली हाथ
मुल्कों को जीत लेने से कोई बनता नही विजेता
दिल जीते जो प्रजा जनों के व्ही है सच्चा नेता
रक्तपात की जंग कौन सा फल अमोघ दे जाती है
तलवारों की जीत अंत में सत्यानाश कराती है
कुदरत नेमत को देने में कभी नही करती है फर्क
सभी मुल्क में एक उष्ण से एक समान चमकता अर्क
निंदा करते है सुपात्र की मूर्ख तुच्छ ईर्ष्यालु जन
श्रेष्ठ बताते अपने को ले गोत्र वंश का अवलम्बन
नियम है बांधे कुदरत ने जो उन्हें मनुज गर तोड़ेगा
कोप प्रक्रति का विप्लव रूप में तब अवश्य ही भोगेगा
कही नस्लभेद का युद्ध है कही मन्दिर मस्जिद के झगडे
कितनो के सर कलम हुए कितने अंधे कितने लंगड़े
मानव मानव है सभी बराबर चाहे रंक हो चाहे भूप
है वसुंधरा पर मानव ही ईश्वर का साक्छात रूप
हीरे मोती के चक्कर में वर्था नस्ट करता जीवन
तीन रत्न है इस दुनिया में अन्न नीर और मधुर बचन
प्रक्रति ने न्र को निज दामन से एक धरा आकाश दिया
मनुज ने उसको निज स्वार्थ वश टुकडो में है बाँट लिया
इन्ही जमीन के टुकडो के हित आपस में शमशीर खिंची
एक शख्श ही तख्त पर बैठा कितनो की है आँख मिंची
न्याय धर्म की बात दूर है नैतिक कर्तब्य है गये भूल
एक सिंहासन की चाहत में बेटे वालिद को गये भूल
शाह मुअज्जम के बेटो ने सत्ता की जो जंग लड़ी
तीन तीन बेटो के रहते तीस दिनों तक लाश सड़ी
अजित्श्त्रू ने सत्ता के हित अपने बाप को मार दिया
औरंगजेब ने गद्दी के हित पिता को कारागार दिया
युगों युगों से चली आ रही दास्तान यह त्रष्णा की
मानव से मानव के शोषण लोभ दम्भ और घ्रणा की
नही है इसका छोर जगत में यह त्रष्णा की पिपासा है
जितनी पूरी होती उतनी जाती बढ़ अभिलाषा है
इसी उद्योग में लगा हुआ जीवन भर तिल तिल मरता है
धन और विलासिता के लालच में नीच कर्म भी करता है
धन ही मानव से देखो क्या क्या काम कराता है
इस तुच्छ द्रव्य के पीछे ही भाई दुश्मन बन जाता है
यही सोच भगवान न छोड़ा अपना घर संसार और रत्न
माया मोह में लाने का तो किया तात ने बहुत प्रयत्न
यूँ संग रहे थे पञ्च भिक्छू पर छोड़ सभी वापस आए
फिर भी भगवान की वत्सलता की ग्यान वही पहले पाए
भगवान पधारे जब नगरी तब थी आई यशोधरा ना
तब यशोधरा के द्वारे पर पड़ा भगवान को ख़ुद जाना
मागी प्रभु ने जब भिक्छा तो था उसने अद्भुत दान दिया
अपने सुत राहुल को दे क्र माता ने काम महान किया
तब प्रभु ने नव संदेश दिया मानवता का उपदेश दिया
सारनाथ में प्रथम बार जन जन ने दिव्य पीयूष पिया
चारो दिश जय जय कर उठी नरता का नया अर्क चमका
छमा दया तप दान अहिंसा से धम्म का नया अर्क दमका
जब तक बनी रहेगी इच्छा सम्भव नही की त्रास मिट जाए
इन्द्रिय निग्रह ही मानव की मुक्ति प्राप्त का एक उपाय
है संसार में दुःख ही दुःख अब यहा न फिर से आने को
है आस्तांगिक मार्ग इन्ही दुखो से मुक्ति पाने को

गजल ७

ओ इतिहास के लिखने वालो उनको तो यूं भूल गये
रास्ट्र स्वतंत्र कराने को थे जो फांसी पर झूल गए
गाँधी नेहरू और सुभाष को दुनिया याद ही करती है
मरे पुलिस की लाठी से जो उनको तो तुम भूल गए
रास्ट्र भवन के कंगूरे का दीप सुहाना लगता है
दीप बने जो भीत ग्रहों के उनको तो तुम भूल गए
जमुना तट पर बना मकबरा दो कब्रों का पत्थर का
उनके नीचे कितनी कब्रे उनको तो तुम भूल गए
ताजमहल है शाहजहाँ का दुनिया ऐसा कहती है
हाथ कटे जिन राजगीर के उनको तो तुम भूल गए

गजल ६

आए हो इस जहाँ में तो जाना ही पड़ेगा
दस्तूर जिंदगी का निभाना ही पड़ेगा
लाखो का कत्ल सर के बस एक ताज के लिए
मुंसिफ को यह हिसाब चुकाना ही पड़ेगा
धोखा दिया फरेब किया लूटमार की
खामियाजा इसका तुम को उठाना ही पड़ेगा
मखमल की म्स्न्दो पे करो ऐश एक दिन
बिस्तर जमी पे तुम को बिछाना ही पड़ेगा