है प्रणाम प्रज्वलित की जिसने गौरवमयीं क्रांति की ज्वाल
जुल्म हिकारत के विरोध में चला उठाकर निर्भय भाल
है प्रणाम उस गौरव शाली दीप्तमान ज्वाला को
नैतिकता का पाठ पढ़ाने
वाली उस शाला को
है प्रणाम उस वीर प्रवर को जिसने यह ज्वाला थामी
है प्रणाम उन कोटि नरो को जो बन गये तूर्ण अनुगामी
यूँ
इतिहास में छीपे हुए है एक से एक वीर इंसान
जो मानवता का प्रति रूप हो कहती दुनिया उसे महान
जां ब लब सिकन्दर था जब तो बोला जो सरदार थे साथ
देना निकाल तुम बाहर यारो कफ़न से मेरे
दोनों हाथ
अजित लड़ाका जिस के आगे रही झुकाती दुनिया माथ
देखे पूर्ण विश्व धरती से गया सिकन्दर खाली हाथ
मुल्कों को जीत लेने से कोई बनता नही विजेता
दिल जीते जो प्रजा जनों के व्ही है सच्चा नेता
रक्तपात की जंग कौन सा फल अमोघ दे जाती है
तलवारों की जीत अंत में सत्यानाश कराती है
कुदरत नेमत को देने में कभी नही करती है फर्क
सभी मुल्क में एक उष्ण से एक समान चमकता अर्क
निंदा करते है सुपात्र की मूर्ख तुच्छ ईर्ष्यालु जन
श्रेष्ठ बताते अपने को ले गोत्र वंश का अवलम्बन
नियम है बांधे कुदरत ने जो उन्हें मनुज गर तोड़ेगा
कोप प्रक्रति का विप्लव रूप में तब अवश्य ही भोगेगा
कही नस्लभेद का युद्ध है कही मन्दिर मस्जिद के झगडे
कितनो के सर कलम हुए कितने अंधे कितने लंगड़े
मानव मानव है सभी बराबर चाहे रंक हो चाहे भूप
है वसुंधरा पर मानव ही ईश्वर का साक्छात रूप
हीरे मोती के चक्कर में वर्था नस्ट करता जीवन
तीन रत्न है इस दुनिया में अन्न नीर और मधुर बचन
प्रक्रति ने न्र को निज दामन से एक धरा आकाश दिया
मनुज ने उसको निज स्वार्थ वश टुकडो में है बाँट लिया
इन्ही जमीन के टुकडो के हित आपस में शमशीर खिंची
एक शख्श ही तख्त पर बैठा कितनो की है आँख मिंची
न्याय धर्म की बात दूर है नैतिक कर्तब्य है गये भूल
एक सिंहासन की चाहत में बेटे वालिद को गये भूल
शाह मुअज्जम के बेटो ने सत्ता की जो जंग लड़ी
तीन तीन बेटो के रहते तीस दिनों तक लाश सड़ी
अजित्श्त्रू ने सत्ता के हित अपने बाप को मार दिया
औरंगजेब ने गद्दी के हित पिता को कारागार दिया
युगों युगों से चली आ रही दास्तान यह त्रष्णा की
मानव से मानव के शोषण लोभ दम्भ और घ्रणा की
नही है इसका छोर जगत में यह त्रष्णा की पिपासा है
जितनी पूरी होती उतनी जाती बढ़ अभिलाषा है
इसी उद्योग में लगा हुआ जीवन भर तिल तिल मरता है
धन और विलासिता के लालच में नीच कर्म भी करता है
धन ही मानव से देखो क्या क्या काम कराता है
इस तुच्छ द्रव्य के पीछे ही भाई दुश्मन बन जाता है
यही सोच भगवान न छोड़ा अपना घर संसार और रत्न
माया मोह में लाने का तो किया तात ने बहुत प्रयत्न
यूँ संग रहे थे पञ्च भिक्छू पर छोड़ सभी वापस आए
फिर भी भगवान की वत्सलता की ग्यान वही पहले पाए
भगवान पधारे जब नगरी तब थी आई यशोधरा ना
तब यशोधरा के द्वारे पर पड़ा भगवान को ख़ुद जाना
मागी प्रभु ने जब भिक्छा तो था उसने अद्भुत दान दिया
अपने सुत राहुल को दे क्र माता ने काम महान किया
तब प्रभु ने नव संदेश दिया मानवता का उपदेश दिया
सारनाथ में प्रथम बार जन जन ने दिव्य पीयूष पिया
चारो दिश जय जय कर उठी नरता का नया अर्क चमका
छमा दया तप दान अहिंसा से धम्म का नया अर्क दमका
जब तक बनी रहेगी इच्छा सम्भव नही की त्रास मिट जाए
इन्द्रिय निग्रह ही मानव की मुक्ति प्राप्त का एक उपाय
है संसार में दुःख ही दुःख अब यहा न फिर से आने को
है आस्तांगिक मार्ग इन्ही दुखो से मुक्ति पाने को