Friday, November 20, 2009

ग़ज़ल ३

गर चेहरे पे तेरे न मुस्कान होती
हमारी तुम्हारी न पहचान होती
तेरे इश्क में न हम होते दीवाने
जो चाहत न इस तरह नादान होती
ना आशिक ही बनते न मजबूर होते
ना यह जिंदगी कुछ परेशान होती
न उल्फत में फंसते न मिटटी में मिलते
मोहब्बत न दिल का जो महमान होती
जो मालूम होता यह अंजाम ऐ उल्फत
तो आशिक के जैसी न पहचान होती

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