Saturday, February 15, 2014

तराना ए रेल

क्यों कर बुझे वो सम्मा ईंधन हो जिसका पानी
 लौ जिसकी रक्स में है वो आग है जवानी

 हुई कोशिशें हजारों कुछ रह गई कमी पर
 तब घूम फिर के जिम्मा आया है अब हमीं पर
 एक ख्वाब जिसने सदिओं सबको जगाए रखा 
 वो जावेदा सवेरा उतरेगा कब जमीं पर

 ये दिल की आग लेकर वो आग है जलानी 
 लौ जिसकी रक्स में है वो आग है जवानी

 तूफां व आंधिओं के जो साथ बह रही है 
 हर जंग ए जिंदगी को जो खेल कह रही है
 वह दूर आशियाना जहाँ मौत रह रही थी
 किस ठाट से वहाँ पर एक शै जो रह रही है

 एक बूंद ही है लेकिन दरिया की है रवानी
 लौ जिसकी रक्स में है वो आग है जवानी

ये जीवन कैसा जीवन है


सारा आकाश है कंधो पर
 जीवन भर ढोते रहना है
 ये कैसी दुनिया शोरिश
की बस ग़म ही सहते रहना है
 यह कैसा जड़वत जीवन है
 जो चलकर भी चलता ही नही
इस राह ए आलम में मैं भी हूँ
 जो जी कर भी जीता ही नहीं
 ना दीवारें हैं जिंदां की
 ना जंजीरों के बंधन
 पर खूंटी पर सा टंगा हुआ
 ये जीवन कैसा जीवन है