सारा आकाश है कंधो पर
जीवन भर ढोते रहना है
ये कैसी दुनिया शोरिश
की बस ग़म ही सहते रहना है
यह कैसा जड़वत जीवन है
जो चलकर भी चलता ही नही
इस राह ए आलम में मैं भी हूँ
जो जी कर भी जीता ही नहीं
ना दीवारें हैं जिंदां की
ना जंजीरों के बंधन
पर खूंटी पर सा टंगा हुआ
ये जीवन कैसा जीवन है

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