Monday, March 29, 2010

गजल 8

जमाल ए आतिश बहार ए शबनम
शफक ए मगरिब खुर्शीद रु है
मै डालता हूँ जहाँ निगाहें
तेरा ही जलवा बस तू ही तू है
कभी तू आये हमारी जानिब
हमारे पहलू में आ कर बैठे
मै तेरी जुल्फों के सायबाँ में
असीर हो जाऊ आरजू है
मेरे जेहन में बसी है तेरी
शमीम शीरी सू ए तसब्बुर
मेरी आकबत मेरा खुदा तू
तू ही नमाज़ ओ तू ही वजू है

No comments:

Post a Comment